दिनांक 28 फरवरी 2016 समय 11.00 से 12.50 बजे तक
आज दिनांक 28 फरवरी 2016 को हम सभी ने माड्यूल 3 अधिगम और उसके सिद्धान्तों का कक्षा में प्रयोग प्रारभ्भिक भाषा और साक्षरता के परिपे्रक्ष्य में हम सभी ने मेंटर अदिती मेम से फोन पर चर्चा किया। यह फोन काल अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। आज के फोन काल का मैं राजेश कुमार सूर्यवंशी जांजगीर-चांपा छत्तीसगढ़ से फीड बैक प्रस्तुत कर रहा हूं- आज के फोन काल में अदिती मेम ने बताया कि एक बच्चा जो अपने परिवेश से जो कुछ लेकर आता है वह उसका पूर्व ज्ञान है हम सबको इससे जोड़ते हुए ही बच्चों को पढ़ाना चाहिए। अधिगम क्या है और क्या नहीं है इस पर भी अदिती मेम ने समझ बनाया। हम सभी ने जाना कि बच्चों को उनके रियल लाइफ से एक्जाम्पल देना चाहिए तो यह स्कील लर्निंग होगी, इसे व्यवस्थित व सुनियोजित करके सिखाना होगा तभी यह लर्निंग अर्थात अधिगम कहलायेगा। बच्चों का मस्तिष्क जितना सक्रिय होगा लर्निंग उतनी ही अधिक अच्छी होगी। जब बच्चों को घर में पढ़ाई लिखाई के बेहतर माहौल मिलता है तो उनका रेडीनस लेवल अच्छा होगा जबकि घर में कोई सीखने का माहौल नहीं मिलता है तो उनके रेडीनस लेवल अच्छा नहीं होगा। अधिगम और मस्तिष्क के बीच संबंध को लेकर अदिती मेम ने अच्छी जानकारी देते हुए बताया कि ब्रेन व लर्निंग पर अनेक रिसर्च हुए है। जो बच्चे एक से अधिक भाषा जानते है उनका दिमाग उन बच्चों के अपेक्षा ज्यादा होता है जो कम भाषा जानते है। हमारे मस्तिष्क का विकास घर, परिवार, स्कूल का माहौल पर निर्भर करता है। जितना इनपुट हमारे मस्तिष्क को मिलता है वह उतना ही विकसित होता है। आइंस्टीन का बेटा आइंस्टीन ही बनेगा यह जरूरी नहीं है। तंत्रिका तंत्र न्यूरल कनेक्शन का विकास बच्चों को अधिकाधिक सीखने के लिए प्रेरित करता है। हमें बच्चों को सीखने के अधिकाधिक मौके देना चाहिए इससे तंत्रिका तंत्र के न्यूरल सिस्टम स्ट्रांग बनती है। कहा जाता है कि 12 साल तक बच्चे सबसे ज्यादा सीखते है। हम बच्चे को नया शब्द पढ़ना सीखा रहे है और वह नहीं पढ़ पा रहा है तो हमें उनके पूर्व ज्ञान शब्दों को तोड़कर सीखाना चाहिए। अक्षर के साउण्ड व सिंबल डिकोडिंग से बच्चा आगे सीखता है। अधिगम संपन्न तभी होगा जब उन्हे उनके पूर्व ज्ञान से जोड़कर पढ़ायेंगे। इसके लिए बच्चों को हमें अलग-अलग स्तर के गतिविधियां कराने की जरूरत है ताकि अलग-अलग स्तर के बच्चों में भी बेहतर ढंग से अधिगम हो सके और यह उनके डीप अंडर स्टेंडिंग में पहुंच सके। अदिती मेम ने बताया कि तनाव से ब्रेन का लोच होता है, उससे बच्चों पर गहरा असर पड़ता है इसके कई कारण है कई बच्चा किसी पाठ को लेकर कि इसे मैं नहीं कर पा रहा हूं उसमें स्ट्रेस होता है। बच्चों को बहुत सरल से बोरियत और कठिनाई से तनाव होता है ऐसे में यह जरूरी है कि अधिगम का स्तर उनके मस्तिष्क के स्तर के आसपास होना चाहिए। हमें आंकलन को परीक्षण की तरह तनावपूर्ण नहीं बनाना चाहिए। आंकलन से बच्चों का वर्तमान स्तर का पता चलता है इसके लिए हमें सतत मूल्यांकन करना चाहिए। बच्चों को बिना डर वाला चिंतामुक्त वातावरण देना चाहिए इससे ही बे्रन का बेहतर विकास होता है। हमें जोखिम लेने के लिए बच्चों को सक्षम बनाना चाहिए, बच्चा यदि गलती कर रहा है तो उनहे डाटना या टोकना नहीं चाहिए, बल्कि उन्हे यह कहे कि तुम कर सकते हो तुम कोशिश करों तब वह बच्चा का लांग टर्म मेमोरी का हिस्सा बन जाता है और वह कभी इसे भूल नहीं पाता है। राजेश कुमार सूर्यवंशी ने कहा कि मनुष्य जीवन भर सीखता है किंतु हमें बच्चों को उनके उम्र व स्तर के अनुसार सीखने के अवसर देने अदिती मेम ने कहा कि हर बच्चे के अलग-अलग लर्निंग नीड को समझते हुए शिक्षक को अपने सिखाने के तरीकों को एडजस्ट करने की जरूरत है तभी हर बच्चा सीख सकेगा। पुष्पा मेडम ने कहा कि सीखने के दौरान कई बच्चे इतने तनाव में आ जाते है कि वो स्कूल आना ही बंद कर देते है, ऐसे में जरूरत मनोरंजक युक्त शिक्षा देने की। अदिती मेम ने कहा कि बच्चों को केवल हम मदद करे तो वो उसे स्वतंत्र रूप से कर पायेंगे। हम करते है और फिर तुम करते हो के सिद्धांत के डायग्राम के उपर अच्छी जानकारी मिली। उन्होंने अधिगम की जिम्मेदारी को निभाने तीन चीजे के बारे में समझाया पहला अधिगम की पूरी जिम्मेदारी शिक्षक के उपर हो, दूसरा शिक्षक व बच्चे दोनों मिलकर जिम्मेदारी पूरी करें तथा तीसरा अधिगम की पूरी जिम्मेदारी बच्चे पर ही हो। जब बच्चे को साउण्ड और सिंबल बता दे तो वह उसे आइडेंटिफाई कर पायेगा। जोन आफ प्राक्सीमेट डवलपमेंट के बारे में मेडम ने विस्तारपूर्वक बताया। उन्होंने कहा कि शिक्षक को पता होना चाहिए कि बच्चा अभी क्या कर सकता है और हमारी मदद से वह जोन आफ प्राक्सीमेट डवलपमेंट तक पहुंच सकता है। इसमें शिक्षक का रोल महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने पूछा कि कक्षा में किस प्रकार का आंकलन करते है। सभी ने अपने-अपने आंकलन के तरीकों को बताया। राजेश कुमार सूर्यवंशी ने बताया कि बच्चा कक्षा के भीतर और कक्षा के बाहर शिक्षक के आंकलन में होता है। इसी तरह से ओम जी ने कहा कि आंकलन से पता चलता है कि अधिगम हो रहा है या नहीं। पुष्पा जी ने कहा कि बच्चा के जिज्ञासा व्यक्त करने से ही उसका पता चलता है अर्थात आंकलन हो जाता है। विद्या मेडम ने कहा कि अधिगम व आंकलन साथ-साथ चलने वाली प्रक्रिया है। वर्ष के 35 से 40 दिन एक्जाम में चले जाते है। अदिती मेम ने कहा कि यदि हम बच्चों का सतत मूल्यांकन कर रहे है तो इसे हमें अपने सिखाने के तरीकों में शामिल करनी चाहिए। दोहरान या रटवाने से लर्निंग नहीं होती है। अंत में अदिती मेम ने सबको निर्देश देते हुए कहा कि पी.पी.टी. का अवलोकन करें और माड्यूल को पूरा पढ़े, कोई विशेष प्रश्न हो तो उसे मेरे ई मेल पर भी भेज सकते है। जरूरत पड़े तो समय निर्धारित कर मुझे फोन काल भी कर सकते है। असाइनमेंट समय से देने तथा उसे किसी से शेयर नहीं करने की बात अदिती मेडम जी द्वारा कही गयी है जिसका हम सबको पालन करना होगा। पूरे फोनकाल के दौरान बीच में कुछ तकनीकी दिक्कतें जरूर आयी किंतु सबके सक्रिय सहभागिता से हमने आज का फोन काल पूरा किया। मेरा आप सभी से निवेदन है कि फोन काल के दौरान विडियो चालू करना, स्पीकर आन करके ध्यान अन्यत्र लगाने, चालू फोन में वेटिंग काल आने जैसे कार्य न करें इससे सभी को परेशानी होती है और फोन काल की समझ में दिक्कत आती है। अंत के रोल काल में ओम नारायण शर्मा जी, भूमिका जी, राजेश कुमार सूर्यवंशी जी, पुष्पा जी, ईश्वरी जी, संगीता जी, जैनीथ जी, हीराधर जी, विद्या डांगे जी, गणेश तिवारी जी आदि ने एक दूसरे को अभिवादन के साथ आज का फोन काल समाप्त किया। सभी को धन्यवाद
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