The Digital Teacher : एस.सी.ई.आर.टी. रायपुर में जिले के शिक्षकों ने लिया डीआरजी का प्रशिक्षण, जिले के लिए बने मास्टर ट्रेनर्स...

एस.सी.ई.आर.टी. रायपुर में जिले के शिक्षकों ने लिया डीआरजी का प्रशिक्षण, जिले के लिए बने मास्टर ट्रेनर्स...


एस.सी.ई.आर.टी. रायपुर द्वारा यूरोपियन कमीशन के अंतर्गत उच्च प्राथमिक स्कूल के शिक्षकों का विज्ञान विषय के उन्मुखीकरण हेतु 27 से 31 अक्टूबर 2012 तक कार्यशाला आयोजित किया गया जिसमें जांजगीर-चांपा, बेमेतरा, राजनांदगाव, दंतेवाड़ा, कांकेर, जशपुर, रायगढ़, रायपुर सहित अन्य जिलों से करीब दो दर्जन से भी अधिक शिक्षक-शिक्षिकाओं ने डी.आर.जी. अर्थात जिला स्त्रोत समूह के सदस्य के रूप में प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रशिक्षण में जांजगीर-चांपा जिले के मास्टर ट्रेनर्स के रूप में सक्ती विकासखण्ड के दो शिक्षकों राजेश कुमार सूर्यवंशी व धनेश्वर प्रसाद पटेल ने डी.आर.जी. का प्रशिक्षण प्राप्त किया। इस दौरान राज्य स्तर के मास्टर ट्रेनर्स राजेश चंदानी, नरेन्द्र तिवारी, शैल पाण्डेय, डा. एम. एल. सोनार, सुश्री अनिता श्रीवास्तव द्वारा भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान से संबंधित प्रायोगिक कार्यों को संपादन कराया गया। पांच दिवसीय प्रशिक्षण में डाइट पेण्ड्रा के वरिष्ठ व्याख्याता नरेन्द्र कुमार तिवारी ने आक्सीकरण, अपचयन, संकेत, सूत्र व रासायनिक अभिक्रिया को बेहतर ढंग से समझाया। वही सेवानिवृत्त प्राचार्य डा. एम.एल.सोनार ने वाष्पोत्सर्जन, फोटो सिंथेसिस अर्थात प्रकाश संश्लेषण, मानव शरीर के सेल, बैक्टीरिया आदि के बारे में विस्तार से प्रदर्शन किया। प्रशिक्षण कार्यक्रम के समन्वयक सहायक प्राध्यापक अनिता श्रीवास्तव ने मानव हृदय के संरचना, हृदय के अलग-अलग अंगों महाधमनी, पल्मोनरी धमनी महाशिरा पल्मोनरी शिरा, दाया आलिंद, बाया आलिंद, दाया निलय व बाया निलय के कार्यों की विस्तृत व्याख्या स्लाइड शो के माध्यम से की। प्रशिक्षण के चतुर्थ दिवस 30 अक्टूबर को सभी प्रशिक्षणार्थियों को 5-5 के अलग-अलग समूहों में बांटकर प्रायोगिक कार्य हेतु गतिविधि प्रपत्र वितरित की गयी जिसके बाद समूहों द्वारा उस पर प्रस्तुतीकरण दी गयी। प्रस्तुतीकरण के दौरान विभिन्न माध्यमों से वायुमण्डल कैसी प्रदूषित होती है इसे छिद्रयुक्त मटका के भीतर अगरबत्ती जलाकर उसके धुएं से यह बताने का प्रयास किया गया कि वाहनों के धुएं, उद्योगों की चिमनी, चूल्हे के धुएं, धूम्रपान व फटाकों के जलने से वायुमण्डल किस तरह से प्रदूषित होती है। इसके अलावा खाद्य श्रृंखला, शरीर की हड्डियों में विभिन्न प्रकार की संधिया, अच्छे बीज व खराब बीज में अंतर, पौधों की पत्तियों द्वारा वाष्पोत्सर्जन, रूधिर की संरचना जिसमें लाल रक्त कण व सफेद रक्त कण, इल्लियों का सूखे से नमी की ओर गमन करना, फफूंद उगाने के तरीके तथा पौधों के श्वसन अंगों की जानकारी प्रयोग कर समझाया गया जिसे सभी ने प्रदर्शन व प्रयोग कर सीखा। कार्यशाला में एस.आर.जी. शैल कुमार पाण्डेय ने लो कास्ट व नो कास्ट आधारित सहायक सामग्रियों का जीवंत प्रदर्शन कर विज्ञान के इस कार्यशाला को रोचक बनाया। उन्होंने बताया कि घर्षण बल गतिशील वस्तुओं को रोकने में सहायता करती है, उन्होंने अपकेन्द्रीय व अभिकेन्द्रीय बल का प्रयोग कर बताया कि अपकेन्द्रिय बल द्वारा भारी वस्तुओं को गुरूत्वाकर्षण बल के विरूद्ध ऊपर खीचा जा सकता है। पदार्थ में उष्मा की चालकता को उनके द्वारा सायकल के स्पोक तार से मोमबत्ती व आलपीन की सहायता से बताया गया। इसके अलावा गतिज ऊर्जा व स्थितिज ऊर्जा का आपस में रूपांतरण को दो बड़े ढक्कन, स्पोक, पेंसिल, भारी नट व धागा की सहायता से उनके द्वारा बताया गया। जड़त्व के सिद्धांत को एक गिलास, पेंसिल व सिक्का की सहायता से बताया गया तो वायुदाब का प्रयोग सिरींज इंजेक्शन व गुब्बारा लेकर बताया गया कि जब पिस्टन को बाहर खीचा जाता है तो सिरींज के भीतर की वायुदाब कम होती है जिससे गुब्बारे की हवा में प्रसार होता है और गुब्बारा फूल जाता है। कार्यशाला के अंतिम दिवस की संध्या काल में एस.सी.ई.आर.टी. के संयुक्त संचालक श्री लकड़ा ने कार्यशाला में पहुंचकर राज्य भर के अलग-अलग जिलों से पहुंचे विज्ञान शिक्षकों को संबोधित कर विज्ञान के प्रयोगों को सरल व रूचिकर बनाते हुए स्कूली बच्चों तक पहुंचाने की बात कही जिसके बाद सभी प्रशिक्षणार्थियों को प्रमाण पत्र वितरण की गयी। संपूर्ण पांच दिवसीय कार्यशाला कार्यक्रम की समन्वयक सहायक प्राध्यापक सुश्री अनिता श्रीवास्तव, राजेश चंदानी, सहायक प्राध्यापक श्रीमती ज्योति चक्रवर्ती, सहायक प्राध्यापक श्रीमती नीलम अरोरा, डा. एम.एल. सोनार, चंद्रभूषण बगरिया, नरेन्द्र कुमार तिवारी के मार्गदर्शन में संपन्न हुई।

       तीन चरणों में जिले भर के मिडिल शालाओं के विज्ञान शिक्षकों को डीआरजी देंगे प्रशिक्षण

राज्य स्तरीय विज्ञान कार्यशाला से लौटकर शिक्षक राजेश कुमार सूर्यवंशी व धनेश्वर प्रसाद पटेल ने बताया कि एस.सी.ई.आर.टी. के उक्त प्रशिक्षण में उन्हें बतौर जिला मास्टर ट्रेनर्स (डी.आर.जी.) हेतु प्रशिक्षण मिला है जहां जांजगीर-चांपा जिले के कुल 9 विकासखण्डों से सभी 134 संकुल केन्द्रों के मिडिल शालाओं के कुल 268 विज्ञान शिक्षकों को तीन चरणों में 5-5 दिवसीय प्रशिक्षण प्रदान किया जायेगा। प्रशिक्षण का प्रथम चरण 19 से 23 नवंबर, द्वितीय चरण 24 से 28 नवंबर तथा तृतीय व अंतिम चरण 29 नवंबर से 3 दिसंबर तक डाइट जांजगीर में संपन्न होगी।
एस.सी.ई.आर.टी. रायपुर राज्य स्तरीय विज्ञान उन्मुखीकरण कार्यशाला 2012 का प्रतिवेदन 

सर्वप्रथम वीणा पाणि मां सरस्वती को प्रणाम और सभी को नमस्कार करता हूं। एस.सी.ई.आर.टी. रायपुर द्वारा आयोजित उच्च प्राथमिक शाला के विज्ञान शिक्षकों का 5 दिवसीय उन्मुखीकरण कार्यशाला के अंतिम व पांचवें दिवस में मैं राजेश कुमार सूर्यवंशी जांजगीर-चांपा जिले से चतुर्थ दिवस के कार्यशाला का प्रतिवेदन प्रस्तुत करने आप लोगों के सामने उपस्थित हूं। कल चतुर्थ दिवस के कार्यशाला का शुभारंभ स्टेट रिसोर्स पर्सन व डाइट पेण्ड्रा के वरिष्ठ व्याख्याता आदरणीय नरेन्द्र कुमार तिवारी के स्पीच के साथ हुआ। श्री तिवारी जी ने आक्सीकरण व अपचयन को अत्यंत ही सहज व सरल तरीके से प्रस्तुत किया साथ ही उदाहरणों को श्याम पट पर लिखकर समझाया। उन्होंने आक्सीकरण के आधारभूत अवधारणा आक्सीजन का जुड़ना, हाइड्रोजन का निकलना, ऋणात्मक अंश का योग व इलेक्ट्रान की कमी की सुंदर व्याख्या की तो वही अपचयन की अवधारणा हाइड्रोजन का जुड़ना (एडीशन आफ हाइड्रोजन), आक्सीजन का निकलना, धनात्मक भाग का योग व इलेक्ट्रान की वृद्धि की व्याख्या की। उन्होंने बताया कि आक्सीकारक जिसके साथ जुड़ते है उसका आक्सीकरण करते है किंतु स्वयं अपचयित हो जाते है आक्सीकारक कहलाते है। तो वही अपचायक जिसके साथ जुड़ते है उसे अपचयित कर देते है किंतु स्वयं आक्सीकृत हो जाते है अपचायक कहलाते है। सूत्र की परिभाषा देते हुए बताया गया कि संकेतों का समूह ही सूत्र कहलाता है। तो वही संकेतो व सूत्रों के माध्यम से किसी रासायनिक अभिक्रिया को अभिव्यक्त करना रासायनिक समीकरण कहलाता है बताया गया। तो वही समीकरण हल करने की अनुमान विधि, आंशिक समीकरण विधि व आयन इलेक्ट्रान विधि सहित कंकाल अर्थात मृत समीकरण के बारे में बताया गया जो कि अत्यंत रोचक और ज्ञानवर्धक रही।इसके पश्चात सेवानिवृत्त प्राचार्य डा. एम.एल.सोनार जी ने अपने स्पीच की शुरूआत वाष्पोत्सर्जन से की, उन्होंने बताया कि शरीर से वाष्प अर्थात पसीने का निकलना वाष्पोत्सर्जन कहलाती है और यह प्रक्रिया पौधों में हमेशा होती रहती है। फोटो सिंथेसिस अर्थात प्रकाश संश्लेषण को विस्तार से समझाते हुए श्री सोनार जी ने बताया कि प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में आक्सीजन निकलती है किंतु यदि पौधे को सूर्य का प्रकाश नहीं दिया जाये अर्थात उसे काला कपड़ा से ढक दिया जाये तो प्रकाश संश्लेषण की क्रिया बाधित होती है। इससे सिद्ध होता है कि अंधेरे में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया नहीं होती। उनके द्वारा दी गयी यह जानकारी कि मानव शरीर के एक सेल अर्थात कोशिका से उसी के जैसा दूसरा मानव उत्पन्न किया जा सकता है अत्यंत ही उपयोगी व ज्ञानवर्धक लगी।
 इसके पश्चात प्रशिक्षण कार्यक्रम के समन्वयक वरिष्ठ सहायक प्राध्यापक अनिता श्रीवास्तव ने मानव हृदय के संरचना की विस्तृत व्याख्यान स्लाइड शो की सहायता से की। उन्होंने हृदय के अलग-अलग अंगों महाधमनी, पल्मोनरी धमनी महाशिरा पल्मोनरी शिरा, दाया आलिंद, बाया आलिंद, दाया निलय व बाया निलय के कार्यों की विस्तृत व्याख्या की। उन्होंने बताया कि स्वस्थ्य मनुष्य के शरीर का रक्त दाब 120/80 तथा स्वस्थ्य मनुष्य के शरीर का तापमान 98.4 फैरनहाइट होता है। उनके द्वारा सेन्टीग्रेड को फैरनहाइट तथा फैरनहाइट को सेन्टीग्रेड ताप पर परिवर्तित करना बताया गया जो अत्यंत ही रोचक लगी। श्रीवास्तव मेडम जी द्वारा दिखायी गयी तापमापी से इस कमरे का तापमान भी हम लोगों के द्वारा नापा गया जो कि दोपहर 12 बजे के दौरान 29 डिग्री सेन्टीग्रेड रही। इसके बाद श्रीवास्तव मेडम जी के द्वारा हम सभी प्रशिक्षणार्थियों को 5-5 के अलग-अलग समूहों में बांटकर प्रायोगिक कार्य हेतु गतिविधि प्रपत्र वितरित की गयी जिसके बाद समूहों द्वारा उस पर प्रस्तुतीकरण दी गयी। प्रस्तुतीकरण के दौरान विभिन्न माध्यमों से वायुमण्डल कैसी प्रदूषित होती है इसे छिद्रयुक्त मटका के भीतर अगरबत्ती जलाकर उसके धुएं से यह बताने का प्रयास किया गया कि वाहनों के धुएं, उद्योगों की चिमनी, चूल्हे के धुएं, धूम्रपान व फटाकों के जलने से वायुमण्डल किस तरह से प्रदूषित होती है। इसके पश्चात दोपहर का भोजनावकाश हुआ और हम सभी भोजन पश्चात पुनः दोपहर 3 बजे प्रशिक्षण हाल में उपस्थित हुए जिसके बाद अलग-अलग समूहों द्वारा विभिन्न प्रायोगिक प्रस्तुतीकरण दी गयी जिसमें खाद्य श्रृंखला, शरीर की हड्डियों में विभिन्न प्रकार की संधिया, अच्छे बीज व खराब बीज में अंतर, पौधों की पत्तियों द्वारा वाष्पोत्सर्जन, रूधिर की संरचना जिसमें लाल रक्त कण व सफेद रक्त कण को लाल-सफेद बिंदी को कांच पर चिपकाकर बताया गया अत्यंत ही रूचिकर लगी। इसी क्रम में आगे इल्लियों का सूखे से नमी की ओर गमन करना, फफूंद उगाने के तरीके तथा पौधों के श्वसन अंगों की जानकारी प्रयोग कर समझाया गया जिसे सभी ने खूब सराहा। कार्यशाला के अगली कड़ी में एस.आर.पी. शैल कुमार पाण्डेय ने लो कास्ट व नो कास्ट आधारित सहायक सामग्रियों का जीवंत प्रदर्शन कर विज्ञान के इस कार्यशाला को रोचक बना दिया। उन्होंने बताया कि घर्षण बल गतिशील वस्तुओं को रोकने में सहायता करती है, उन्होंने अपकेन्द्रीय व अभिकेन्द्रीय बल का प्रयोग कर बताया कि अपकेन्द्रिय बल द्वारा भारी वस्तुओं को गुरूत्वाकर्षण बल के विरूद्ध ऊपर खीचा जा सकता है। पदार्थ में उष्मा की चालकता को उनके द्वारा सायकल के स्पोक तार से मोमबत्ती व आलपीन की सहायता से बताया गया। इसके अलावा गतिज ऊर्जा व स्थितिज ऊर्जा का आपस में रूपांतरण को दो बड़े ढक्कन, स्पोक, पेंसिल, भारी नट व धागा की सहायता से उनके द्वारा बताया गया। जड़त्व के सिद्धांत को एक गिलास, पेंसिल व सिक्का की सहायता से बताया गया तो वायुदाब का प्रयोग सिरींज इंजेक्शन व गुब्बारा लेकर बताया गया कि जब पिस्टन को बाहर खीचा जाता है तो सिरींज के भीतर की वायुदाब कम होती है जिससे गुब्बारे की हवा में प्रसार होता है और गुब्बारा फूल जाता है। इस तरह से चतुर्थ दिवस के कार्यशाला का समापन शाम 6 बजे हुआ।


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