The Digital Teacher : शहीद चन्द्रशेखर ’आजाद’ की पुण्यतिथि पर डिजिटल स्कूल में बायोपिक का प्रदर्शन

शहीद चन्द्रशेखर ’आजाद’ की पुण्यतिथि पर डिजिटल स्कूल में बायोपिक का प्रदर्शन

भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के स्वतंत्रता सेनानी शहीद चन्द्रशेखर ’आजाद’ की आज 27 फरवरी को शहादत तिथि पर डिजिटल विद्यालय में उनकी जीवनी पर आधारित फिल्म का प्रदर्शन कर बच्चों को उनकी बलिदान से अवगत कराया गया। 
विदित हो कि बाल संसद की अगुवाई में महापुरूषों की जीवनी पर विद्यालय में फिल्म प्रदर्शन कर महापुरूषों के जीवनगाथा से विद्यार्थियों को रूबरू कराने की परंपरा शा.पूर्व मा.शाला नवापारा अमोदा (नवागढ़) के डिजिटल क्लास रूम में चली आ रही है। इसी कड़ी में चंद्रशेखर आजाद जिनका आज ही के दिन 27 फरवरी 1931 को शहादत हुआ था। उनकी जीवनी पर आधारित सिनेमा का प्रदर्शन किया गया। इसके बाद उनकी जीवनी पर चर्चा करते हुए विद्यार्थियों को डिजिटल क्लास रूम के संचालक नवाचारी शिक्षक राजेश कुमार सूर्यवंशी ने बताया कि आयोजन का उद्देश्य महापुरूषों की जीवनी से आज की पीढ़ी को अवगत कराना है। उन्होंने बताया कि आजाद का जन्म 2३ जुलाई 1906 को हुआ तथा 27 फरवरी 1931 को अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गये थे। वे शहीद राम प्रसाद बिस्मिल व शहीद भगत सिंह सरीखे क्रान्तिकारी साथियों में से थे। सन् 1922 में गाँधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को अचानक बन्द कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन के सक्रिय सदस्य बन गये। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में पहले 9 अगस्त 1925 को काकोरी काण्ड किया और फरार हो गये। इसके पश्चात् सन् 1927 में ’बिस्मिल’ के साथ ४ प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसियेशन का गठन किया तथा भगत सिंह के साथ लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला साण्डर्स का हत्या करके लिया एवं दिल्ली पहुँच कर असेम्बली बम काण्ड को अंजाम दिया। 1919 में हुए अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार ने देश के नवयुवकों को उद्वेलित कर दिया। चन्द्रशेखर उस समय पढाई कर रहे थे किंतु उनके मन में देश के प्रति बलिदान की भावना जागृत हो गयी थी। चन्द्रशेखर आज़ाद के ही सफल नेतृत्व में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली की केन्द्रीय असेंबली में बम विस्फोट किया था। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेज सैनिकों ने उन्हे धोखे से घेर लिया और खूब गोलीबारी हुई किंतु आजाद ने अपनी ही बंदूक की गोली से अपने सिर पर वार कर शहीद हो गये। इसके बाद क्रांतिकारियों में देश को आजाद कराने की लहर दौड़ गयी। जिस वृक्ष के नीचे आजाद शहीद हुए थे लोग उस वृक्ष की पूजा करने लगे। वृक्ष के
तने के इर्द-गिर्द झण्डियाँ बाँध दी गयीं। लोग उस स्थान की माटी को कपडों में शीशियों में भरकर ले जाने लगे। वर्तमान में वह स्थान ऐतिहासिक और दर्शनीय स्थल बन चुका है। आजाद प्रखर देशभक्त थे। काकोरी काण्ड में फरार होने के बाद से ही उन्होंने छिपने के लिए साधु का वेश बनाना बखूबी सीख लिया था और इसका उपयोग उन्होंने कई बार किया। प्रायः सभी क्रान्तिकारी उन दिनों रूस की क्रान्तिकारी कहानियों से अत्यधिक प्रभावित थे आजाद भी थे लेकिन वे खुद पढ़ने के बजाय दूसरों से सुनने में ज्यादा आनन्दित होते थे। इस अवसर पर प्रधान पाठक कन्हैया लाल मरावी, कर्मचारी साधराम यादव, एसएमसी के सदस्यगण सहित विद्यार्थीगण बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

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