The Digital Teacher : शाला प्रबंधन को सक्रिय कर विद्यालय में शैक्षणिक वातावरण का किया जा सकता है निर्माण-राजेश सूर्यवंशी

शाला प्रबंधन को सक्रिय कर विद्यालय में शैक्षणिक वातावरण का किया जा सकता है निर्माण-राजेश सूर्यवंशी

सक्रिय शाला प्रबंधन की विद्यालय के प्रति भूमिका

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 छ.ग. राज्य में लागू हो चुका है जिसके तहत 6 से 14 आयु समूह के सभी बच्चों का विद्यालय में नामांकन, ठहराव, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सहित अनेक अधिकार बच्चों को स्वमेव ही प्राप्त हो चुका है और इस अधिनियम के सफल क्रियान्वयन में शाला प्रबंधन समिति की महत्वपूर्ण भूमिका है। स्कूल चलाने के लिए बेहतर संसाधनों में चाक, ब्लैकबोर्ड और शिक्षक का विद्यालय के प्रति समर्पण की भावना के अलावा शाला प्रबंधन समिति की सक्रियता अत्यंत आवश्यक है। वास्तव में शिक्षक और शाला प्रबंधन समिति मिल जाये तो विद्यालय किसी भी समस्या को पार करते हुए उत्कृष्टता के मापदण्डों को प्राप्त कर सकता है। स्कूल संचालन पूरी तरह से एक प्रबंधन है। शाला प्रबंधन समिति वास्तव में खुद एक तंत्र है सफलता की सीढ़ी है। डा.एपीजे अब्दुल कलाम गुणवत्ता अभियान के तहत वर्तमान में शाला सिद्धि योजना चलायी जा रही है जिसके तहत प्रत्येक विद्यालयों को अपना मिशन स्टेटमेंट तैयार कर शाला सिद्धि योजना के वेबसाइट में पंजीयन करते हुए अपलोड करना है, किंतु मिशन स्टेटमेंट एसएमसी की भूमिका, सक्रियता और सहयोग के बिना संभव नहीं है। विद्यालय में तीन उत्सव बहुत महत्वपूर्ण है पहला स्वतंत्रता दिवस, दूसरा गणतंत्र दिवस तथा तीसरा शाला प्रवेश उत्सव, इसके अलावा भी महापुरूषों की जयंतियां व अन्य उत्सव विद्यालय स्तर पर आयोजित किये जाते है जिसमें शाला प्रबंधन समिति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। शाला प्रबंधन समिति की मदद से विद्यालय में अपेक्षित शैक्षिक गुणवत्ता प्राप्त किया जा सकता है। शैक्षिक गुणवत्ता से तात्पर्य है कि जिस कक्षा में बालक पढ़ता है, उस कक्षा की अपेक्षित दक्षताओं को बालक अपनी क्षमता के अनुसार सीखे। सक्रिय शाला प्रबंधन का ही नतीजा है कि हम सरकारी विद्यालयों में शिक्षा के स्तर को बेहतर बनाने काम कर पा रहे है और हम अपने स्कूलों की स्थिति व शैक्षिक स्तर का उत्तरोत्तर वृद्धि कर पा रहे है। वर्तमान में बच्चों का नामांकन, शाला में ठहराव से लेकर सभी शैक्षणिक क्षेत्रों में अभूतपूर्व सफलता देखने को मिल रही है।

शाला  प्रबंधन समिति गठन संबंधी प्रावधान

निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम 2009 को सुचारू रूप से लागू करने, पालकों को शाला से जोड़ने एवं उनके अधिकारों एवं कर्तव्यों से अवगत कराने धारा 21 में विद्यालय प्रबंधन समिति का गठन एवं गठन से संबंधित कानून निर्धारित किये गये है। आरटीई की धारा 21 (1) धारा 2 के खण्ड के उपखण्ड 4 के तहत प्रत्येक सरकारी विद्यालयों में प्रवेश प्राप्त बालकों के माता-पिता या संरक्षक और शिक्षकों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों से मिलकर एक विद्यालय प्रबंध समिति गठित किया जाना है जिसमें कम से कम तीन चौथाई सदस्य माता-पिता या संरक्षक होंगे और ऐसे समिति के 50 प्रतिशत सदस्य महिलाएं होंगी। समिति का चयन खुली बैठक में किया जाये और इसके लिए गांव में विधिवत कोटवार से मुनादी भी करायी जाये कराके तथा यह प्रयास किये जाये कि गठन के समय संकुल प्रभारी, बीईओ या बीआरसीसी भी उपस्थित रहे। विद्यालयों के बेहतर संचालन के लिए जरूरी है कि सक्रिय लोग एसएमसी के सदस्य बनें। एक सशक्त एवं सक्रिय एसएमसी बेहतर शिक्षा के लिए सकारात्मक पहल कर सकती है। विद्यालय प्रबंधन समिति विद्यालयों के विकास के लिए तीन वर्षीय कार्य योजना बनाने से लेकर उसके सफल क्रियान्वयन तक में महती भूमिका अदा करते है। जुलाई 2016 के प्रथम सप्ताह में जांजगीर-चांपा जिले के नवागढ़ ब्लाक संकुल केन्द्र अमोदा के शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला नवापारा में शाला प्रबंधन समिति गठित करने की प्रक्रिया संपन्न करायी गयी। इस दिन स्कूल प्रांगण में पालकों की संख्या और उनका उत्साह देखते ही बन रहा था, यह स्कूल में कार्यरत शिक्षकों की सफल प्रयास का ही सुखद परिणाम था क्योंकि उन्होंने सबसे पहले गांव के गणमान्य व्यक्ति एवं पंचायत प्रतिनिधियों से संपर्क किया, निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की जानकारी दी तथा उसके तहत बनने वाली विद्यालय प्रबंधन समिति के महत्व, गठन प्रक्रिया पर चर्चा करते हुए मुनादी भी करायी गयी थी। बच्चों को बताया गया था कि वे अपने माता-पिता को शाला आने के लिए जरूर कहे। विद्यालय पहुंचने वाले सभी पालकों का विद्यालय के शिक्षकों ने यथायोग्य सम्मान किया तथा ग्राम पंचायत के सरपंच श्री सोनाराम साहू के मार्गदर्शन में विद्यालय प्रबंधन समिति के गठन की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। विद्यालय में पदस्थ नवाचारी शिक्षक श्री राजेश कुमार सूर्यवंशी ने उपस्थित जनसमूह को बताया कि समिति में अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष पद पर माता पिता अथवा संरक्षक का रहना क्यों जरूरी है तथा 50 प्रतिशत महिलाओं का होना क्यों आवश्यक है? इसके बाद आये हुए लोगों के द्वारा सदस्यों के नामों का चयन किया गया। सर्वसम्मति से ग्राम पंचायत सरपंच श्री सोनाराम साहू को अध्यक्ष निर्वाचित किया गया।



शाला  प्रबंधन समिति के अधिकार एवं कर्तव्य

किसी भी शासकीय विद्यालय में शाला प्रबंधन समिति के प्रमुख अधिकार व कर्तव्य इस प्रकार से उल्लेखित किया जा सकता है-

(1) यह देखना कि गांव में 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों का नामांकन विद्यालय में है या नहीं, शिक्षकों द्वारा किये जाने वाले सर्वे में सहयोग करना।

(2) यदि कोई भी बच्चा विद्यालय में दाखिला नहीं लिया है तो उसे दाखिला दिलवाना।

(3) विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों की नियमित उपस्थिति व ठहराव के लिए प्रयास करना।

(4) विद्यालय की आवश्यकताओं के अनुसार सहयोग करना व कार्य योजना बनाकर क्रियान्वयन करना।

(5) विद्यालय के विभिन्न आवश्यकता की पूर्ति के लिए समिति सदस्यों द्वारा जिम्मेदारी लेना।

(6) 6 से 14 आयु समूह के बच्चे यदि किन्ही कारणों से प्रारंभिक शिक्षा से छूट रहे है तो उन्हें आयु के अनुरूप कक्षा में प्रवेश दिलवाना।

(7) अपने आसपास विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान करना।

(8) विद्यालयों में चलाये जा रहे मध्यान्ह भोजन का क्रियान्वयन, साफ सफाई आदि का मानीटर करना तथा उनमें सुधार करना।

(9) शिक्षक, माता-पिता व संरक्षक के साथ नियमित बैठके करना।

(10) शाला में अध्ययनरत बच्चों की शैक्षिक स्तरों पर चर्चा करना व सुधार हेतु योजना बनाना।

(11) बच्चों की प्रगति व शैक्षिक गुणवत्ता पर चर्चा करना।

(12) अच्छे कार्यों के लिए शिक्षक, बच्चों व सदस्यों को प्रोत्साहित करना।

(13) शाला को मिलने वाली भौतिक व वित्तीय सुविधाओं का लेखा जोखा रखना।

(14) कोई भी शासकीय शिक्षक ट्यूशन नहीं पढ़ायेगा इसकी मानिटरिंग करना।

(15) सभी शिक्षक नियमित व पूर्ण समय तक शाला में उपस्थित रहे यह सुनिश्चित करना।

(16) कोई भी विद्यालय जाति, लिंग, निःशक्तता के आधार पर किसी बच्चे को प्रवेश से वंचित न करें यह तय करना।

(17) समय-समय पर विभाग द्वारा आयोजित प्रशिक्षणों में सहभागिता निभाना।

(18) एसएमसी अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति सचेत होकर ऐसी और कई समस्याओं का समाधान करने के लिए पूर्ण रूप से सक्षम है।

निष्क्रिय शाला प्रबंधन समिति के विद्यालय में प्रभाव

यदि किसी सरकारी विद्यालय में गठित शाला प्रबंधन समिति निष्क्रिय है तो इसके कई नकारात्मक परिणाम विद्यालय में परिलक्षित होते है जिसमें कुछ उदाहरण इस प्रकार से हो सकते है-

(1) बच्चों का अनुपस्थित रहना पढ़ाई के प्रति रूचि न लेना।

(2) शिक्षकों की अनियमित उपस्थिति व अध्यापन के प्रति रूचि न लेना।

(3) विद्यालय में शिक्षण विधि रोचक व बाल केन्द्रित न होना।

(4) गतिविधि आधारित शिक्षण न होकर व्याख्यान विधि से शिक्षण करना

(5) कक्षा की बैठक व्यवस्था सीटिंग प्लान सही न होना और बच्चों का हीन भावना से ग्रसित होना।

(6) माता पिता व समुदाय का स्कूल एवं बच्चों के प्रति उदासीन बरताव होना।

(7) कक्षा कक्ष वातावरण, शिक्षक एवं छात्र व्यवहार तथा छात्र से छात्र का व्यवहार  बेहतर नहीं होना।

इस प्रकार की कमजोरी से शैक्षिक गुणवत्ता नहीं आती इसके विपरित शाला प्रबंधन समिति के मार्गदर्शन व सक्रियता से यह सब समस्या दूर किया जा सकता है। हम जानते है कि पालक बच्चों के प्रथम गुरू होते है, और शाला प्रबंधन समिति के सदस्य के रूप में हम इनके प्रथम गुरू को विद्यालय से यदि जोड़कर रखते है तो वे शालेय शिक्षा के अलावा बच्चों की गतिविधि उनके व्यवहार पर नजर रखते हुए उन्हें आगे बढ़ाने में सहयोग कर सकते है। विद्यालय गांव की धरोहर है, उसकी हर गतिविधि जनता की शक्ति है, स्कूल की हर उपलब्धि गांव की शान है, इसी शान को बनाये रखने की जिम्मेदारी सभी ग्रामवासी और विद्यालय प्रबंध समिति का महत्वपूर्ण दायित्व है।

सक्रिय शाला प्रबंधन समिति के विद्यालय में प्रभाव

किसी भी विद्यालय के संपूर्ण विकास में शाला प्रबंधन समिति की अहम भूमिका होती है। यदि समिति के सदस्य सक्रिय हो तो वे विद्यालय के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए देश व समाज हित में अप्रत्यक्ष रूप से योगदान दे रहे होते है। वास्तव में शाला प्रबंधन समिति के गठन के पीछे शासन की मंशा विद्यालय का संपूर्ण विकास व बेहतर संचालन करना है। प्रत्येक स्कूल के स्टाफ शाला प्रबंधन समिति के मार्गदर्शन वांछित उपलब्धि हासिल कर सकता है, यदि स्कूल स्टाफ विषम परिस्थिति का रोना रोते रहे तो वे काम कब करेंगे? कोई भी स्कूल स्टाफ सभी उपलब्ध संसाधनों में अच्छे से काम कर सकते है किंतु उनकी क्षमताओं की सही परीक्षा तो तब है जब कम से कम संसाधनों में प्रबंधन समिति के सहयोग व मार्गदर्शन में बेहतर काम करके दिखाया जाये। इस तरह के कार्यों का उदाहरण है शासकीय पूर्व माध्य. शाला नवापारा, जांजगीर-चांपा जिले के नवागढ़ विकासखण्ड में संकुल केन्द्र अमोदा के अंतर्गत स्थापित यह विद्यालय शाला प्रबंधन समिति की सक्रिय सहभागिता से जिले में उत्कृष्ट शैक्षणिक व रचनात्मक गतिविधियों के लिए ख्याति प्राप्त कर रहा है। यहां शिक्षकों की लगन व समिति की सक्रियता से जिले का पहला डिजिटल क्लास रूम की स्थापना की गयी, समुदाय से विद्यालय को कम्प्यूटर, पंखा, दरी सहित अन्य संसाधन उपहार के रूप में प्राप्त हो रहे है। विद्यालय के बड़े परिसर को जो कि डेढ़ साल पहले तक केवल मैदान था आज सैकड़ों पौधे वृक्ष का रूप ले रहे है, पूरा परिसर आक्सीजन जोन में तब्दील हो चुका है। विद्यालय के शिक्षक द्वारा विज्ञान क्लब बनाया गया और उसे विपनेट विज्ञान प्रसार संस्थान से पंजीकृत कराया गया, सारी गतिविधियों का ब्यौरा प्रति माह विपनेट को ई मेल से प्रेषित किया जाता है। शाला प्रबंधन समिति के अध्यक्ष प्रत्येक वर्ष तीनों कक्षाओं में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त करने वाले विद्यार्थी को नगद राशि से सम्मानित करते है, विज्ञान दिवस, पर्यावरण दिवस, विश्व जल दिवस जैसे आयोजनों को समारोह पूर्वक मनाया जाता है जिसमें पूरे ग्रामीणों की बढ़ चढ़कर सहभागिता रहती है। शाला प्रबंधन समिति के मार्गदर्शन में पर्यावरण सहित शैक्षणिक गतिविधियों में रचनात्मक कार्य करने वाले विद्यालय के शिक्षक पंचायत श्री राजेश कुमार सूर्यवंशी को छ.ग. के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह द्वारा सम्मान प्राप्त हो चुका है, इसके अलावा जिला प्रशासन द्वारा गणतंत्र दिवस समारोह में उत्कृष्ट शिक्षक के रूप में विगत दो वर्षों से सम्मानित किया जा रहा है। इसके अलावा राज्य स्तर पर प्रकाशित चर्चा पत्र, डाइट स्तर पर प्रकाशित पत्रिका, जिला प्रशासन द्वारा प्रकाशित वार्षिक पत्रिका जाज्वल्या सहित समाचार पत्रों व न्यूज चैनलों में विद्यालय के अच्छे कार्यों का प्रकाशन किया जाता रहा है। इस विद्यालय के विकास से संबंधित सभी निर्णय विद्यालय प्रबंधन समिति के मार्गदर्शन में लिए जाते हैं। एसएमसी मेंबर, अभिभावकों व शिक्षकों के बीच संवाद स्थापित कर शैक्षणिक गुणवत्ता को बढ़ावा दिया जाता है। शाला प्रबंधन समिति की मासिक बैठक में शासन द्वारा चलाये जा रहे कल्याणकारी योजनाओं पर चर्चा होती है, वर्तमान में शिक्षा के अधिकार कानून के तहत लागू प्रावधानों की जानकारी शिक्षकों द्वारा दी जाती है, विद्यालय में विभिन्न गतिविधियों के आयोजन व इसके क्रियान्वयन में आने वाली कठिनाईयों को दूर करने पर विचार-विमर्श किया जाता है। शिक्षकों द्वारा विभागीय प्रशिक्षणों के अनुभवों साझा भी किया जाता है। बैठक में परिचर्चा के दौरान शिक्षा के अधिकार कानून का उसकी सही भावना के साथ क्रियान्वयन करने पर ज्यादा जोर दिया जाता है ताकि सभी बच्चों विशेषकर वंचित एवं सुविधा विहीन बच्चों को शिक्षा की सुलभता, गुणवत्ता के साथ उपलब्ध हो सके। विद्यालय में शैक्षणिक गुणवत्ता को बढ़ावा देने समय-समय पर समुदाय के ऐसे लोग जो विभिन्न व्यवसायों से जुड़े है, को कक्षा में लाकर बच्चों के समक्ष चर्चा व गतिविधि आदि करवायी जाती है। लगातार अनुपस्थित रहने वाले बच्चों के माता-पिता और अभिभावक से संपर्क कर उपस्थिति बढ़ाने के प्रयास किये जाते है। इसके अलावा बाल श्रम, माता पिता के साथ पलायन करने वाले बच्चों की वापसी के प्रयास पर चर्चा होती है। मध्यान्ह भोजन का सफल क्रियान्वयन, शाला का बेहतर तरीके संचालन, मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता एवं बच्चों की सुरक्षा के मुद्दों पर भी बेहतर ढंग से चर्चा होती है और कार्य योजना बनती है।

सारांश-

सक्रिय शाला प्रबंधन समिति की विद्यालय के प्रति भूमिका से हम न केवल अपेक्षित दक्षताओं को प्राप्त करते है अपितु हम अपने नैतिक कर्तव्य को भी पूरा करते है और देश के लिए जिम्मेदार भावी नागरिक का निर्माण करते है। शाला प्रबंधन समिति की सक्रियता से विद्यालय में नामांकन बढ़ता है, नामांकन बढ़ने के बाद उसके ठहराव पर काम होता है और फिर अपेक्षित शैक्षणिक गुणवत्ता की प्राप्ति होती है। विद्यालय में नामांकित बच्चों का भविष्य विद्यालय प्रबंधन समिति के उपर निर्भर है। विद्यालय में शिक्षा का माहौल बनाने के साथ विद्यालय को आकर्षक बनाने का दायित्व विद्यालय प्रबंधन समिति का है। विद्यालय में आनंददायी शिक्षा का वातावरण, बच्चों की उपस्थिति और ठहराव में बढ़ोत्तरी सबकुछ शाला प्रबंधन समिति की सक्रियता से ही संभव है। शाला प्रबंधन समिति की नियमित बैठक कर कोई भी विद्यालय बेहतर से बेहतर विद्यालय के रूप में परिणित हो सकता है।  सरकारी स्कूलों में बच्चों के शैक्षणिक विकास को लेकर सरकार की ओर से चलाए डा.एपीजे अब्दुल कलाम शिक्षा गुणवत्ता अभियान जैसे प्रयास जमीनी स्तर पर शाला प्रबंधन समिति की सक्रियता से ही सफल हो सकती है। प्रत्येक विद्यालय के शिक्षक स्टाफ को शाला प्रबंधन समिति को सक्रिय कर उनके साथ मिलजुल कर ही काम करने की आवश्यकता है। वास्तव में यदि विद्यालय प्रबंधन समिति अपने कार्यों और दायित्वों का पालन न्याय संगत ढंग से करे तो विद्यालय सही मायने में शिक्षा का मंदिर बन जायेगा। समिति के सदस्यों की सक्रियता से ही विद्यालय का चहुंमुखी विकास होता है और इससे समाज व देश का भला होता है।






 

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