राज्य स्तरीय ईको बाल मेला व सर्वश्रेष्ठ ईको क्लब प्रतियोगिता में जांजगीर-चांपा जिले का उत्कृष्ट प्रदर्शन, पर्यावरण मंत्री ने मा. मोहम्मद अकबर ने किया पुरस्कृत...
इको क्लब सदस्यों ने चलाया पेयजल स्त्रोत व शौचालय स्थलों पर सफाई अभियान ...
इको क्लब की मासिक बैठक में स्वच्छ जल व शौचालयों के रखरखाव पर हुई चर्चा...
इको क्लब पूर्व माध्य. शाला नवापारा (अमोदा) की मासिक बैठक 1 अक्टूबर शनिवार 2022 को आहूत की गयी जिसमें विगत माह में क्लब के गतिविधियों की समीक्षा की गयी साथ ही आगामी माह में होने वाली क्लब की गतिविधियों की योजना तैयार की गयी। इस दौरान विद्यालय में सभी विद्यार्थियों हेतु स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता व शौचालयों के नियमित रख रखाव सफाई पर चर्चा की गयी। विगत माह में विश्व ओजोन दिवस, विश्व हिंदी दिवस, पोषण मास अभियान, विश्व रैबीज दिवस, अंतरराष्टीय वृद्धजन दिवस व गांधी जयंती जैसे आयोजनों को समारोह पूर्वक मनाया गया। वही अक्टूबर 2022 में आने वाले विविध आयोजनों को मनाये जाने की योजना बनायी गयी। उक्त सभी आयोजनों के दौरान पौधारोपण कर उसे वृक्ष बनाने का संकल्प पारित किया गया है। क्लब के संबंध में जानकारी देते हुए प्रभारी शिक्षक राजेश कुमार सूर्यवंशी ने बताया कि छात्र-छात्राओं में जीवन कौशल विकास, आत्मसम्मान बढ़ाने, जल व पर्यावरण संरक्षण सहित विविध शैक्षणिक नवाचारी गतिविधियों में सहभागिता निभाने के उद्देश्य से शाला प्रबंधन समिति अध्यक्ष श्री चंदराम साहू, शाला आपदा प्रबंधन समिति के अध्यक्ष श्रीमती सावित्री बाई चौहान, प्रधान पाठक श्री भानूप्रताप महाराणा के मार्गदर्शन में इको क्लब का गठन किया गया है। इस क्लब का नाम पृथ्वी-जल-वायु इको क्लब रखा गया है। क्लब के माध्यम से विद्यार्थी रचनात्मक गतिविधि से जुड़ रहे है साथ ही विद्यार्थीगण अपने अभिभावक, पड़ोस एवं समुदाय को पर्यावरण व जैव विविधता के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ ही पर्यावरण गतिविधियों में संलग्न कर रहे है। विभिन्न तरह के प्रोजेक्ट बनाने से लेकर स्वच्छता कार्यक्रम चलाने, बच्चों के नाखून, बाल आदि की प्रार्थना सभा में जांच करने, खेल व शारीरिक गतिविधियों का आयोजन करने, योग, ड्रामा, वाद-विवाद, सांस्कृतिक गतिविधियां, भाषण, निबंध लेखन, पत्र लेखन, चित्रकला, साहित्यिक व सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन इको क्लब के देखरेख में संपन्न हो रहा है। वर्षभर महापुरूषों की जयंती समारोह, दिवस विशेष कार्यक्रम, विश्व स्तर के दिवस जैसे आयोजनों को समारोह पूर्वक मनाया जाता है तथा प्रत्येक आयोजन को यादगार बनाने विद्यालय परिसर में पौधारोपण कर उसके संरक्षण की जिम्मेदारी ली जाती है। इको क्लब के के प्रभारी शिक्षक श्री राजेश कुमार सूर्यवंशी है। गठित क्लब में सदस्यों की संख्या 20 है जिसमें 10 छात्र सुमित कुमार साहू, अनिल कुमार यादव, मनीष कुमार यादव, महारथी साहू, प्रशांत कश्यप, दीपक कश्यप, शिवा केंवट, कुश कुमार यादव, गौरव यादव, हिमेश देवांगन तथा 10 छात्राएं आशा साहू, सिमरन यादव, पूजा कंवर, श्रुति चौहान, छाया यादव, खुश्बू बरेठ, मंजू साहू, गीतांजली यादव, संजना यादव, रजनी यादव शामिल है।
राज्य स्तरीय ईको क्लब प्रतियोगिता व ईको बाल मेला हेतु डिजिटल स्कूल के 3 बच्चों का चयन ...
वायुसेना को मिली स्वदेशी ताकत, रक्षामंत्री श्री राजनाथ सिंह ने लाइट काम्बैट हेलीकाप्टर देश को किया समर्पित...


गांधी जयंती पर बच्चों व शिक्षकों ने देखी गांधी फिल्म, गांव में चलाया स्वच्छता अभियान...
जांजगीर-चांपा जिले के शास.पूर्व माध्य.शाला नवापारा (अमोदा) में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के जन्म दिवस को स्वच्छता अभियान के रूप में मनाया गया। इस दौरान एक स्वच्छता जागरूकता रैली निकाली गयी जिसमंे बच्चों व शिक्षकों ने घर-घर जाकर स्वच्छता अभियान का महत्व बताया। इस अवसर पर राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गाँधी के वास्तविक जीवन पर आधारित वर्ष 1982 में बनी फिल्म गांधी जिसके निर्देशक रिचर्ड एटनबरो तथा बेन किंग्सले गाँधी की भूमिका में है, का डिजिटल कक्ष में प्रदर्शन किया गया। बच्चों ने गांधी के जीवनी से प्रेरित होकर आज से अपना कार्य स्वयं करने व समय पर पूर्ण करने की शपथ ली। गांधी व शास्त्री की जयंती को यादगार बनाने स्कूल परिसर में फलदार पौधे रोपित कर उसे वृक्ष बनाने का संकल्प लिया गया। इस संबंध में कार्यक्रम के संयोजक शिक्षक श्री राजेश सूर्यवंशी ने बताया कि 2 अक्टूबर को रविवार अवकाश की वजह से इस आयोजन को 1 अक्टूबर शनिवार को विद्यालय में मनाया गया है। वर्ष 2014 में गांधी जयंती के अवसर पर देश भर में स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत की गयी थी जिसके 8 वर्ष पूरे होने पर विद्यालय परिवार ने गांव में स्वच्छता जागरूकता रैली निकालकर घर, परिवेश, गांव, गली व पेयजल स्त्रोतों को साफ रखने की अपील किया तथा दैनिक जीवन में स्वच्छता का महत्व बताया गया। कार्यक्रम को सफल बनाने में शाला प्रबंधन समिति अध्यक्ष श्री चंदराम साहू, श्रीमती सावित्री चौहान, प्रधान पाठक श्री भानूप्रताप महाराणा, शिक्षक श्री कन्हैयालाल मरावी, श्री हेमंत यादव सहित विद्यार्थियों का सराहनीय योगदान रहा।
डिजिटल क्लासरूम में बच्चों ने देखी गांधी फिल्म- गाँधी 1982 में बनी फिल्म है जो लोकप्रिय भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, अहिंसावादी राष्ट्रनायक एवं भारत के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले मोहनदास करमचंद गाँधी जिन्हें आदरभाव के साथ बापू और महात्मा गांधी भी कहा जाता है उनके वास्तविक जीवन पर आधारित है। फिल्म का निर्देशन रिचर्ड एटनबरो द्वारा किया गया है और इसमें बेन किंग्सले गाँधी की भूमिका में है। इस फिल्म के लिए दोनों को अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म के अकादमी पुरस्कार के साथ आठ अन्य अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुए। यह भारतीय और यूनाइटेड किंगडम की फिल्म निर्माता कंपनियों द्वारा बनाई गई सांझा फिल्म थी। इसका प्रीमियर नई दिल्ली में 30 नवम्बर 1982 को हुआ था।
मोहनदास करमचंद गांधी जी का जीवन परिचय
प्रारंभिक जीवन –
महात्मा गाँधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को ब्रिटिश भारत में गुजरात राज्य के काठियाड जिले के पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम करमचंद गाँधी और माता का नाम पुतली बाई था। इनके पिता पोरबंदर के दीवान थे। पुतली बाई इनके पिता की चौथी पत्नी थी क्योकि इनसे पहले उनकी तीन पत्नियों की प्रसव के दौरान मृत्यु हो चुकी थी। इनके भाई का नाम लक्ष्मीदास और करसन दास और एक बहन थी जिनका नाम रालियातबेन था।
वैवाहिक जीवन –
14 वर्ष की भी आयु पूरी न कर पाने से पहले ही मई 1883 में इनका विवाह कस्तूरबाई माखनजी कपाड़िया (कस्तूरबा गाँधी) से कर दिया गया। 1885 ईo में इनकी पहली संतान का जन्म हुआ पर वह कुछ दिन ही जीवित रह सकी। बाद में 1888 में इनके पुत्र हरीलाल का जन्म हुआ 1892 में मणीलाल, 1897 में रामदास का और 1900 में देवदास का। यही इनके चार पुत्र थे। 1944 में पूना में कस्तूरबा गाँधी की मृत्यु हो गयी।
शिक्षा व करियर –
गाँधी जी ने राजकोट से सन 1887 में हाईस्कूल किया और कानून की पढाई के लिए 1889 में बम्बई से इंग्लैण्ड गए और 1891 में बेरिएस्टर की डिग्री प्राप्त की। बापस लौटने के बाद राजकोट और बम्बई में वकालत शुरू की परन्तु कामयाब नहीं हुए। फिर दक्षिण अफ्रीका में एक भारतीय व्यापारी अब्दुल्ला ने उन्हें मुक़दमे की पैरवी के लिए आमंत्रित किया और तब गाँधी जी 1893 में दक्षिण अफ्रीका गए। वहां पद भारतीयों के सतह हो रहे भेद भाव से ये दुखी हुए और वहीँ रह कर उनके लिए कुछ करने की ठान ली। यहीं पर इनके साथ भी एक दुखद घटना हुयी जब ये दक्षिण अफ्रीका में डबरन से प्रिटोरिया एक रेल से रिजर्वेशन करा के जा रहे थे तो मैरिट्सबर्ग में एक अंग्रेज ट्रेन में चढ़ा उसे एक अश्वेत (गाँधी जी ) के साथ रेल में सफर करना श्रम की बात लगा और उसने स्थानीय पुलिस की मदद से गाँधी जी को ट्रेन से नीचे उतरवा दिया। बस इसी घटना ने गाँधी जी के ह्रदय में अंग्रेजो के प्रति क्रांति की भावना के बीज बो दिए और वही दिन था जब गाँधी जी ने मन में निश्चय कर लिया कि अंग्रेजो तुमने मुझे रेल ने निकला है एक दिन मैं तुम्हे अपने देश से निकाल फेकूंगा और उन्होंने 15 अगस्त 1947 को यह कर दिखाया। वहीं पर इन्होने 1894 में नटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की। 1904 में फीनिक्स आश्रम की स्थापना की और 1910 में टॉलस्टाय फार्म की स्थापना की। सत्याग्रह/अवज्ञा आंदोलन का पहला प्रयोग गाँधी जी ने यहीं पर 1906 में किया। दक्षिण अफ्रीका से इनकी बापसी 9 जनवरी 1915 को हुयी और ये मुंबई के अपोलो बंदरगाह पर उतरे इसी दिन भारत में प्रवासी भारतीय दिवस मनाया जाता है।
महात्मा गाँधी जी के लोकप्रिय भजन :-
राजनीतिक जीवन :-
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का तृतीय चरण (1919 – 1947)
दक्षिण अफ्रीका से भारत बापसी के बाद ये गोपाल कृष्ण गोखले के संपर्क में आये और उन्हें अपना राजनीतिक गुरु बना लिया और उन्ही के जरिये ये भारतीय राजनीती में सक्रीय हुए। 1916 ईo में गाँधी जी ने अहमदाबाद के पास साबरमती आश्रम की स्थापना की। अखिल भारतीय राजनीती में इनका पहला साहसिक कदम चम्पारण सत्याग्रह था।
चम्पारण सत्याग्रह (1917) –
इस सत्याग्रह के लिए चम्पारण के रामचंद्र शुक्ल ने गाँधी जी को चम्पारण आने के लिए आमंत्रित किया था। चम्पारण सत्याग्रह बिहार के चम्पारण जिले में किसानो पर हो रहे अत्याचारों के विरोध में किया गया था। यहाँ पर किसानो को अपनी जमीन के ३/20 हिस्से पर नील के खेती करना और उसे यूरोपीय मालिकों को एक निर्धारित दाम पर बेचना अनिवार्य कर दिया गया था। इसे ही तिनकठिया पद्यति भी कहा जाता था। इस सत्याग्रह के बाद सरकार द्वारा एक आयोग गठित किया गया और किसानो की समस्या को सुलझा दिया गया इस तरह इनका पहला सत्याग्रह सफल रहा। एन जी रंगा ने गाँधी जी के इस सत्याग्रह का विरोध किया था। इसी सत्याग्रह के दौरान रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इन्हे ‘माहात्मा’ की उपाधि दी।
अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन (1918) –
चम्पारण की सफलता के बाद इनका अगला कदम अहमदाबाद की एक कॉटन टेक्सटाइल मिल और उसके मजदूरों के बीच मजदूरी बढ़ाने को लेकर हुए विवाद में हस्तक्षेप करना था। विवाद का कारण प्लेग बोनस था जिसे मिल मालिक प्लेग के ख़त्म होने के बाद ख़त्म करना चाहते थे लेकिन मजदुर प्रथम विश्व युद्ध के कारण बढ़ी महंगाई के मद्देनजर इस बोनस को जारी रखने की मांग कर रहे थे। अंत में आंदोलन के बाद मजदूरों की माँगो को स्वीकार कर लिया गया और 35% बोनस देने की माँग मान ली।
खेड़ा सत्याग्रह (1918) –
गुजरात के खेड़ा जिले में किसानो की फसल नष्ट हो जाने के बाबजूद भी किसानो से लगान बसूला जा रहा था जिससे किसानो की दशा बहुत ख़राब हो गयी थी अतः गाँधी जी और विट्ठल भाई पटेल ने यहाँ आंदोलन किया और सरकार ने यह घोषणा कर दी की जो किसान लगान दे सकते है उन्ही से लगान बसूला जाये और इस तरह यह आंदोलन समाप्त हो गया।
खिलाफत आंदोलन ( 1919-22) –
यह आंदोलन खलीफा की सत्ता की पुनर्स्थापना के लिए चलाया गया था। दरअसल हुआ ये था कि प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय मुसलमानो ने अंग्रेजो की सहायता इस शर्त पर की थी कि वे इनके धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे और उनके धार्मिक स्थलों की रक्षा करेंगे परन्तु युद्ध समाप्ति के बाद ब्रिटिश सरकार अपने वाडे से मुकर गयी और ब्रिटेन व तुर्की के बीच हुयी ‘सेवर्स की संधि’ के तहत तुर्की के सुल्तान के सारे अधिकार छीन लिए गए। उस समय इस्लाम जगत में तुर्की के सुल्तान का बहुत सम्मान था वे सब उन्हें अपना खलीफा मानते थे परन्तु ब्रिटिश सरकार के इस कारनामे के बाद वे सब सरकार से नफरत करने लगे। लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में हुए कलकत्ता अधिवेशन (सितंबर 1920) में खिलाफत आंदोलन के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया। इस आंदोलन का सर्वाधिक विरोध चितरंजन दास ने किया था। कुछ अन्य कांग्रेसी नेताओं जैसे – जिन्ना, एनी बेसेंट और बिपिन चंद्र पाल ने भी इसका विरोध किया और कांग्रेस छोड़ दी। 1924 में यह आंदोलन उस वक्त समाप्त हो गया जब तुर्की में कमाल पाशा के नेतृत्व में सरकार बनी और खलीफा के पद को समाप्त कर दिया गया।
असहयोग आंदोलन (1920-22) –
गाँधी जी ने यह आंदोलन 1 अगस्त 1920 को प्रारम्भ किया। दिसंबर 1920 के कांग्रेज के नागपुर अधिवेशन में असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव को पारित कर दिया गया। इस आंदोलन के खर्च हेतु 1921 ईo में तिलक स्वराज फण्ड की स्थापना की गयी जिसमे ६ माह के भीतर ही 1 करोड़ रूपये जमा हो गए। इस आंदोलन में एक नई चीज सामने आयी कि इस बार वैधानिक साधनो के अंतर्गत स्वराज्य प्राप्ति की विचारधारा को त्याग दिया गया और इसके स्थान पर सरकार के सक्रिय विरोध की बात सामने आयी।इस आंदोलन के तहत गांधीजी ने अपनी कैसर-ए-हिंद की उपाधि त्याग दी साथ ही जमनालाल बजाज ने ‘राय बहादुर’ की। इस आंदोलन के दौरान बहुत से वकीलों ने अपनी वकालत त्याग दी। इस आंदोलन की सफलता के लिए गाँधी जी ने कुछ नियम अपनाने को कहा जो की निम्न है –
- कर न देना
- हाथ से बने खादी कपड़ो का अधिकाधिक प्रयोग
- छुआछूत का परित्याग
- सम्पूर्ण देश को कांग्रेस के झंडे के नीचे लाना
- हिन्दू मुस्लिम एकता
- स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग
- अहिंसा पर बल
- कानूनों की अवज्ञा करना
- मद्य वहिष्कार
इसी आंदोलन के दौरान काशी विद्यापीठ और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना हुयी। 1021 में लॉर्ड रीडिंग वायसराय बनकर भारत आये और दमन चक्र प्रारम्भ हुआ नेताओं की गिरफ़्तारी होने लगी जिसमे सबसे पहले गिरफ्तार होने वाले प्रमुख नेता मुहम्मद अली थे। नवंबर 1921 में प्रिंस ऑफ़ वेल्स के भारत आगमन पर काले झंडे दिखाए गए जिससे सर्कार क्रुद्ध हो गयी और कठोर दमन चक्र प्रारम्भ कर दिया जिससे आंदोलन और गरमा गया। 5 फरवरी 1922 को संयुक्त प्रान्त के गोरखपुर जिले के चौरा-चौरी में किसानो के जुलुस पर प्रशासन ने गोली चलवा दी जिससे क्रुद्ध भीड़ ने तीन फूंक दिया जिसमे एक थानेदार सहित 21 सिपाहियों की मृत्यु हो गयी। इस घटना से क्षुब्ध होकर गाँधी जी ने 12 फरवरी को बारदोली में कांग्रेस समिति की बैठक बुलाई जिसमे असहयोग आंदोलन के स्थगन की घोषणा कर दी।
इसके बाद सरकार ने 22 मार्च को गाँधी जी को गिरफ्तार कर लिया और 6 साल की सजा सुनाई गयी परन्तु बाद में इन्हे आपरेश (आंतो के आपरेशन के लिए) कराने के लिए 2 साल बाद ही 5 फरवरी 1924 को रिहा कर दिया गया (इन दो सालो में ही कांग्रेस दो गुटों चितरंजन दास व मोतीलाल ग्रुप और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी व पटेल ग्रुप में बँट गयी)।
मृत्यु –
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी की हत्या 30 जनवरी 1948 को बिड़ला भवन में हिन्दू महासभा से सम्बंधित एक हिन्दू राष्ट्रवादी नाथूराम गोडसे नामक ने कर दी। इनकी शवयात्रा 8 किलो मीटर लम्बी थी। बाद में गोडसे को गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया गया और 15 नवम्बर 1949 को फाँसी दे दी गयी। महात्मा गाँधी की समाधि राजघाट (नई दिल्ली) में स्थित है।
गाँधी जी के अन्य नाम :-
महात्मा – रवीन्द्रनाथ टैगोर ने
राष्ट्रपिता – सुभाषचंद्र बोस ने
बापू – जवाहरलाल नेहरू ने
मलंग बाबा – खुदाई खिदमतगार ने
जादूगर – शेख मुजीब उर रहमान ने
अर्द्धनग्न फ़कीर – विंस्टन चर्चिल ने
सदी का पुरुष – अलबर्ट आइंस्टीन ने
महात्मा गाँधी जी द्वारा लिखित पुस्तकें :-
1909 में ‘हिन्द स्वराज’ लिखी
सत्य के साथ प्रयोग ( My Experiment With Truth ) – आत्मकथा (प्रकाशन – 29 नवंबर 1925 से 3 फरवरी 1929 तक)
Satyagrah in South Africa
On Non Violence
The Words of Gandhi
Non Violent Resistance
सम्मान व पुरस्कार :-
1930 ईo में टाइम पत्रिका द्वारा पर्सन ऑफ़ ईयर चुने गए।
इनका नाम 5 बार शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए भेजा गया परन्तु इनका चुनाव नहीं हुआ।
महात्मा गाँधी के बारे में अन्य तथ्यात्मक जानकारी :-
- महात्मा गाँधी का सबसे पुराना आश्रम – फीनिक्स (डरबन)
- इन्होंने अछूतों को हरिजन कहा।
- 12 अप्रैल 1919 को रवीन्द्र नाथ टैगोर ने महात्मा गाँधी जी के नाम एक पत्र लिखकर भेजा जिसमें पहली बार इन्हें ‘माहात्मा‘ के नाम से सांबोधित किया।
- 4 जून 1944 को सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर से रेडियो पर महात्मा गाँधी को सम्बोधित एक सन्देश दिया जिसमे उन्होंने ही सबसे पहले इन्हें ‘राष्ट्रपिता’ कहा।
लाल बहादुर शास्त्री का जीवन परिचय
लाल बहादुर शास्त्री का आरंभिक जीवन
लाल बहादुर जी को बचपन में परिवार के सदस्य ‘नन्हे’ कहकर बुलाते थे। बचपन में ही शास्त्री की के पिता का स्वर्गवास हो गया। इसमें बाद लाल बहादुर जी की माता इन्हें लेकर अपने पिता हजारी लाल के घर मिर्जापुर आ गई। कुछ समय पश्चात इनके नाना का भी देहांत हो गया।
इनकी प्राथमिक शिक्षा मिर्ज़ापुर में ही हुई एवम आगे का अध्ययन हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी-विद्यापीठ में हुआ। लाल बहादुर जी ने संस्कृत भाषा में स्नातक किया था। काशी-विद्यापीठ में इन्होने ‘शास्त्री’ की उपाधि प्राप्त की. इस वक्त के बाद से ही इन्होने ‘शास्त्री’ को अपने नाम के साथ जोड़ दिया। इसके बाद इन्हें शास्त्री के नाम से जाना जाने लगा। 1928 में इनका विवाह ललिता शास्त्री के साथ हुआ। इनके छह संताने हुई. इनके एक पुत्र अनिल शास्त्री काँग्रेस पार्टी के सदस्य रहे।
लाल बहादुर शास्त्री एक जवान सत्याग्रही
स्वतन्त्रता की लड़ाई में शास्त्री जी ने ‘मरो नहीं मारो’ का नारा दिया, जिसने पुरे देश में स्वतन्त्रता की ज्वाला को तीव्र कर दिया। 1920 में शास्त्रीजी आजादी की लड़ाई में कूद पड़े और ‘भारत सेवक संघ’ की सेवा में जुड़ गये। यह एक ‘गाँधी-वादी’ नेता थे, जिन्होंने सम्पूर्ण जीवन देश और गरीबो की सेवा में लगा दिया। शास्त्री जी सभी आंदोलनों एवम कार्यक्रमो में हिस्सा लिया करते थे, जिसके फलस्वरूप कई बार उन्हें जेल भी जाना पड़ा . इन्होने सक्रिय रूप से 1921 में ‘अहसयोग-आन्दोलन’, 1930 में ‘दांडी-यात्रा’, एवम 1942 में भारत छोडो आन्दोलन में महत्वपूर्ण भागीदारी निभाई।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत में आजादी की लड़ाई को भी तीव्र कर दिया गया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने ‘आजाद हिन्द फ़ौज’ का गठन कर उसे “दिल्ली-चलो” का नारा दिया और इसी वक्त 8 अगस्त 1942 में गाँधी जी के ‘भारत-छोडो आन्दोलन’ ने तीव्रता पकड़ ली थी। इसी दौरान शास्त्री जी ने भारतीयो को जगाने के लिए “करो या मरो” का नारा दिया, परन्तु 9 अगस्त 1942 को शास्त्री जी ने इलाहबाद में इस नारे में परिवर्तन कर इसे “मरो नहीं मारो” कर देश वासियों का आव्हान किया। इस आन्दोलन के समय शास्त्री जी ग्यारह दिन भूमिगत रहे, फिर 19 अगस्त 1942 को गिरफ्तार कर लिए गये।
Ans : लाल बहादुर वर्मा।
Ans : आजादी में लड़ाई में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया और किसानों के हित के लिए कार्य किये।
Ans : सूचना एवं प्रसारण मंत्री।
Ans : 2 अक्टूबर 1909 में उत्तरप्रदेश के वाराणसी के मुगलसराय क्षेत्र में हुआ।
Ans : कायस्थ।
Ans : भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी।
Ans : वर्मा बाद में उन्हें शास्त्री नाम मिला।
Ans : ताशकंद में पाकिस्तान के साथ शांति समझौता साइन करने के बाद अचानक दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई।
Ans : लाल बहादुर शास्त्री जी की मृत्यु का कारण अभी तक राज बना हुआ है।
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